Desi Love Story वेश्या पड़ गई पल्ले

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Desi Love Story वेश्या पड़ गई पल्ले

‘‘मालूम है मालूम क्यों नहीं।’’ रोहित तुरन्त ही स्वर में तेजी लाते हुए बोला, ‘‘सौम्या-सौम्या ही बोलता हूं मैं तो उसे। अब नाम चाहे जो भी हो उसका।’’
‘‘लड़की तो अच्छी है।’’ राघव ने दूर जा चुकी उस लड़की की ओर से निगाहें फेर, रोहित की ओर देखा, ‘‘पर उम्र में तुझसे दो एक साल बड़ी लगती है।’’
‘‘नहीं यार! मुझसे साल भर छोटी है।’’ रोहित लापरवाही से मुंह सिकोड़ते हुए बोला।
‘‘यह मैं नहीं मान सकता लड़की की उम्र तुझसे ज्यादा है कम से कम दो साल ज्यादा है।’’
‘‘बहस छोड़ चल मान ले तेरी ही बात सही हो। वो दो साल बड़ी उससे क्या फर्क पड़ता है?’’ रोहित लापरवाही से कंधे झटकते हुए बोला।
‘‘क्यों? कोई फर्क नहीं पड़ता?’’ राघव ने आश्चर्य जताया।
‘‘क्या फर्क पड़ता है यार?’’ रोहित ने मानों उल्टे सवाल किया।
‘‘भई! इश्क करने तक तो ठीक कोई फर्क नहीं पड़ता पर कल को तेरा इश्क ज्यादा जोर पकड़ गया और तूने अपनी दिलरूबा से शादी करने की ठान ली तो बड़ी उम्र की पत्नी क्या तुझे रास आयेगी?’’
‘‘क्यों नहीं आयेगी? अरे भई भगवान कृष्ण की प्रेमिका राधा उम्र में भगवान से बड़ी थी। गांधी जी अपनी पत्नी कस्तूरबा से छोटे थे। सुनील दत्त नरगिस जी से छोटे थे और का जाना माना क्रिकेटियर सचिन तेन्दुलकर अंजली से पांच साल छोटा है।’’
‘‘माई गाॅड! तुम तो शादी के लिए पक्की स्कीम बनाये बैठे हो।’’ राघव हंसा ‘‘खैर, कल मेरा बर्थडे है तू कल मेरे घर आ आई विल ट्रीट यू बाकी बातें तभी करेंगे।’’
‘‘पर यार! तेरा घर…मैंने देखा तो है नहीं।’’
‘‘अबे! एक बार आयेगा तभी ना देखेगा। एडरेस नोट कर वैसे मैं तुझे बाहर ही मिल जाऊंगा।’’
‘‘बाहर ही क्यों? तुम्हारे यहां बर्थ डे पर बर्थ डे किड को घर बाहर निकाल दिया जाता है क्या?’’
‘‘नहीं यार! मैं बर्थ डे पर सिर्फ तुझे ही बुला रहा हूं और किसी को नहीं। तू होगा और मेरी फैमिली होगी मेरी फैमिली से तेरा इन्ट्रोडक्शन भी हो जाएगा।’’
‘‘ठीक है। कोशिश करूंगा आने की।’’ रोहित ने गहरी सांस ली।
‘‘कोशिश नहींµतुझे आना ही है सरटेनली।’’ राघव ने जोर डाला।
‘‘ओ. के.।’’ रोहित ने वायदा कर लिया और अगले रोज वह खुद ही कार लेकर उस मोहल्ले में पहुंचा जहां का एडरेस राघव ने उसे लिखवाया था। रोहित शहर के जाने माने करोड़पति का लड़का था। जबकि राघव एक बेहद निम्न वर्गीय परिवार से था। मगर दोनों में दोस्ती बड़ी प्रगाढ़ थी। दोनों का ही काॅलेज में पहला साल था।
राघव गली में ही खड़ा बेचैनी से रोहित का इंतजार कर रहा था। रोहित की कार देखते ही उसकी बांछें खिल गई।
रोहित ने कार राघव के निकट ही रोकी फिर राघव रोहित को, अपने साथ ही अपने घर ले गया।
राघव के पिता के आधे शरीर को लकवा मार गया था। वह हरदम बिस्तर पर ही पड़े रहते थे। उस रोज मां भी बीमार थी। फिर भी राघव के माता-पिता से रोहित का परिचय तो हुआ।

 

‘‘तेरा घर खर्च कैसे चलता है यार?’’ राघव के घर की दयनीय स्थिति देखते हुए रोहित पूछ बैठा।
‘‘दीदी एक प्राइवेट फर्म में सर्विस करती हैं। अभी तो वहीं चलाती हैं घर का खर्च।’’
‘‘दीदी।’’ रोहित चैंका। क्योंकि तभी खुशबुओं का एक झोंका सा घर में दाखिल हुआ था और उस झोंके कि दिशा में नजर पड़ते ही वह एकदम सन्न सा रह गया था।
एकदम वही सूरत उसके सामने थी, जिसे पिछले दिन अपनी दिलरूबा बताकर उसने दूर से ही राघव को दिखाया था और उसका नाम सौम्या या सुमन बताया था।
‘‘यह मेरी दीदी मिताली हैं और दीदी ये है रोहित! मेरा सबसे अच्छा फास्ट फ्रेन्ड। पर कल मैं एक बार इसका मुंह तोड़ने वाला था।’’
राघव परिचय कराते हुए बोला।
‘‘राघव यार।’’ रोहित ने भर्राये स्वर मंे शिकायत व शर्मिन्दगी भरे लहजे में कहा। राघव मुस्कराया। धीरे से उसने रोहित का कन्धा थपथपाया ‘‘इट्स आल ओ.के.। मुझे मालूम है डींगें हांकने की तुम्हारी आदत है, वरना कल उस समय तुम्हारे मन में कुछ नहीं था।’’
‘‘पर यार तेरे को…।’’ रोहित ने कुछ कहना चाहा। तभी मिताली की मीठी सुरीली आवाज ठण्डी हवा के झोंके सी सनसनाई, ‘‘भई! बात क्या है हमें भी तो बताओ।’’
‘‘कुछ नहीं दीदी।’’ राघव ने टालने के भाव में कहा।
‘‘झूठ नहीं बोलो राघव।’’ मिताली ने कृत्रिम क्रोध प्रकट किया, ‘‘हमें मालूम है बात कुछ हमारे बारे में ही हो रही है।’’
‘‘वो बात यह है दीदी…।’’
‘‘बात-बात कुछ नहीं साफ-साफ सच-सच बोलो। तुम्हें मालूम है हमें झूठ से सख्त नफरत है…।’’
‘‘पर दीदी…आपको…’’
‘‘तुम बोलो तो सही आई प्राॅमिस बात कुछ भी हो कैसी भी हो मैं बुरा नहीं मानूंगी।’’
‘‘नहीं राघव!’’ तभी रोहित ने याचना भरी निगाहों से राघव को देखा।
एक गहरी सांस ली राघव ने। फिर धीरे से बोला, ‘‘बात कुछ ऐसी है तुम यकीन नहीं करोगी दीदी।’’
‘‘तुम बताओ तो सही।’’ मिताली गुर्राई। उसके चेहरे पर झल्लाहट व खीझ के भाव उभर आये।
‘‘नहीं राघव प्लीज आ एम साॅरी!’’ रोहित ने फिर से अनुनय किया।

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राघव ने रोहित की रिक्वेस्ट पर ध्यान न दिया। उसने अपनी ही रौ में कहना शुरू किया, ‘‘दीदी! कल हमने तुम्हारी हमशक्ल बिल्कुल तुम्हारी टू कापी एक लड़की को देखा रोहित ने बताया वो इसकी दिलरूबा है और उसका नाम सौम्या या सुमन है।’’
‘‘मुझे बना रहे हो?’’ मिताली मुस्कराई। ‘‘नहीं दीदी! उस समय हम विकासपुरी के बस स्टैण्ड पर खड़े थे कि अचानक बिल्कुल सामने से तुम्हारे जैसी हूबहू तुम्हारी डुप्लीकेट लड़की गुजरी थी।’’
‘‘और वो मैं नहीं थी?’’ मिताली हंसी।
‘‘बिल्कुल नहीं दीदीµतुम होती तो हमें देखकर रूकती बोलती डांटती या कुछ तो कहती।’’
‘‘जरूर-जरूर! पर कितने बजे की बात है यह! चार-साढ़े चार बज रहे होंगे।’’
‘‘हां। टाइम तो यही था।’’

‘‘हुम्म! और वो लड़की भी मैं ही थी पर मैंने तुम लोगों की ओर ध्यान नहीं दिया।’’ मिताली मुस्कराई, ‘‘मुझे मालूम नहीं था तुम लोग बस स्टाॅप पर लड़कियों को ताकने झांकने के लिए खड़े रहते हो?’’
‘‘सभी लड़के ऐसा ही करते हैं दीदी।’’ राघव मासूमियत से बोला।
‘‘अच्छा…।’’ मिताली का हाथ राघव को मारने के लिए उठा पर राघव एक झटके से पीछे हट गया और उसका हाथ पूरी तेजी के साथ रोहित की पीठ पर पड़ा।
‘‘ओह साॅरी…।’’ मिताली ने झेपे अंदाज में रोहित को देखा। फिर बोली, ‘‘आईन्दा किसी लड़की को अपनी दिलरूबा मत बताना।’’

 

रोहित तो पहले ही शर्म से पानी-पानी हो रहा था। क्या कहता? सिर झुकाये चुपचाप खड़ा रहा।
फिर मिताली ने अपने बैग से एक बीस का नोट निकालकर राघव की ओर बढ़ा दिया। बोली, ‘‘राघव! तुम अपने दोस्त के लिए कुछ समोसे जलेबी लेकर आओ तब तक हम दोनों गपशप करते हैं।’’
‘‘नहीं-नहीं। मैं चलूंगा।’’ शर्मसार हो रहे रोहित ने तुरन्त ही चलने का उपक्रम किया। मगर तभी मिताली ने उसका हाथ थाम, उसे जबरन सोफे पर बैठा दिया ‘‘ऐसे कैसे चल जाओगे? पहली बार हमारे घर आये हो फिर अभी तो राघव का बर्थ डे भी सेलिब्रेट करना है।’’
राघव फटाफट समोसे जलेबी लाने के लिए दौड़ गया।
‘‘तुम्हारी बात का मैंने बुरा नहीं माना है इसलिए मन में गिल्टी भाव मत रखो और इधर मेरी तरफ देखो।’’ राघव के जाने के बाद रोहित का कंधा थपथपाते हुए मिताली ने प्रेमपूर्वक कहा।
रोहित ने मिताली की ओर देखा। बड़ी मुश्किल से, झिझकते झिझकते ही वह हिम्मत पैदा कर सका था।
‘‘आज तक कभी किसी ने मेरी तारीफ नहीं की थी इसलिए तुमने जो कुछ भी कहा बुरा नहीं लगा। चलो, मैं तुम्हारी दिलरूबा बनने के लायक नहींµपर हम अच्छे दोस्त तो बन ही सकते हैं।’’
‘‘जी।’’ रोहित हड़बड़ा कर रह गया।
‘‘इसका मतलब है मैं दोस्ती के लायक भी नहीं हूं।’’
‘‘म-म-मैंने तो यह तो नहीं कहा।’’
‘‘तो फिर….कुछ कहो ना। तुम तो कुछ कह ही नहीं रहे हो?’’ मिताली मुस्कराई।
‘‘क्या कहूं?’’ गहरी सांस ली रोहित ने।
‘‘यह बताओ कि मैं सुन्दर हूं?’’
‘‘ब-ब-बहुत सुन्दर।’’ रोहित हकलाते हुए कह ही गया।

‘‘तुम्हें अच्छी लगी हूं?’’
‘‘बहुत!’’ रोहित धीरे-से बोला। ‘‘मुझसे प्यार करोगे?’’ मिताली ने शरारत भरे अन्दाज में, सरगोशी में ही पूछा।
रोहित के सारे बदन में सनसनी सी दौड़ गई।
‘‘अच्छा। कल बारह बजे कनाॅट प्लेस रिवोली में मिलना। मैं तुमसे मिलने वहीं पहुंचूंगी।’’
और इस प्रकार मिताली के रूप सौन्दर्य व उसकी मीठी-मीठी बातों के जादू में फंस गया रोहित। वह रोज ही वक्त निकालकर मिताली से मिलने लगा। धीरे-धीरे मिताली ने उस पर अपने चुम्बनों व आलिंगनों की ‘कृपा’ भी लुटानी शुरू कर दी। पर इससे आगे उसने रोहित को कभी भी बढ़ने नहीं दिया।
रोहित सचमुच प्यार करने लगा मिताली को। अब वह सचमुच उसकी दिलरूबा बन चुकी थी।
मिताली ने एक रोज इसका रास्ता भी सुण दिया शादी।
परन्तु रोहित जानता था कि उसके पिता एक मामूली घराने की लड़की से उसकी शादी के लिए कभी तैयार ना होंगे। आखिर वह एक करोड़पति का इकलौता बेटा था। तब मिताली ने ही रास्ता सुझाई और एक दिन रजिस्ट्रार आॅफिस मैरिज के सामने रोहित व मिताली ने विवाह के लिए एप्लीकेशन दाखिल कर दी। एक महीने बाद वे कोर्ट के सामने कानूनी रूप से पति पत्नी बन गये। उसी रोज शाम को उनका सादे ढंग से रीति रिवाज के अनुसार भी विवाह सम्पन्न हो गया। उस विवाह में मिताली का पूरा परिवार व उसकी सखी सहेलियां शामिल थी। किन्तु रोहित के सिर्फ कुछ दोस्त ही सम्मिलित हुए थे।
विवाह के तुरन्त बाद रोहित मिताली को एक किराये के फ्लैट में ले गया। जिसका उसने पहले से ही बंदोबस्त कर लिया था। किन्तु सुहागरात ना मना सका। वह उसके एक दोस्त ने जो कि उसके घर के करीब ही रहता था देर रात को आकर उसे सूचना दी कि उसके पिता को हार्ट अटैक हो गया है।
घर पहुंचने पर उसकी मुलाकात दिनेश बाबू से हुई, जोकि उनकी फर्म के मैनेजर तो थे ही पारिवारिक मित्र व रोहित के पिता प्रेमनाथ तिवारी के बहुत गहरे दोस्त थे।
दिनेश बाबू ने उसे शादी की मुबारकबाद दी तो वह चैंक गया, क्योंकि मिताली के साथ उसने तय किया था कि शादी की बात वे लोग अभी कुछ महीने गुप्त रखेंगे पर दिनेश बाबू से ही उसे पता चला कि उसकी शादी की बात अब गुप्त नहीं थी। बल्कि शाम के अखबार में रोहित व मिताली की तस्वीरें भी छपी थीं, जिनके साथ मैटर यह था कि करोड़पति के बेटे द्वारा मध्यम श्रेणी के गरीब परिवार की लड़की से विवाह करने का आदर्श प्रस्तुत किया गया है।
दिनेश बाबू ने ही उसे बताया कि सेठ साहब यानि रोहित के पिता को दिल का दौरा रोहित व मिताली की तस्वीर देखकर ही पड़ा है।
पर ऐसा क्यों हुआ? रोहित समझ न पाया। समझता भी कैसे? मिताली ने उसे कभी भी यह नहीं बताया था कि घर का खर्च चलाने के लिए वह कालगर्ल का धंधा करती रही हैं और यह तो मिताली खुद भी नहीं जानती थी कि अपने धंधे के दौरान जिन-जिन लोगों के साथ वह हमबिस्तर हो चुकी है उनमें सेठ प्रेमनाथ तिवारी (रोहित का बाप), बहुत बार उसके शरीर का खरीदार रह चुका है।
कहानी लेखक की कल्पना मात्र पर आधारित है।

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