प्यासी औरतें Desi Sex Stories

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प्यासी औरतें Desi Sex Stories

वह दरवाजे पर दस्तक देने ही वाली थी कि तभी उसे चांदनी की मस्ती भरी सीत्कार सुनाई दी। सुलेखा ने मन ही मन सोचा चांदनी के साथ यह कौन मर्द हो सकता है? क्योंकि चांदनी का पति राजशेखर तो दो दिनों के लिए बाहर गया हुआ था।
सुलेखा का हाथ रूक गया। उसके दिल में गुदगुदी-सी हुई और दांतों तले तर्जनी दबाकर वह हंसने लगी। जिज्ञासावश उसने दरवाजे की झिर्री से आंखें सटा दी और अंदर झांक कर देखने लगी।
कमरे का दृश्य देखकर सुलेखा सकते में आ गयी। भीतर बिस्तर पर बहुत उत्तेजक दृश्य था। एकदम किसी ‘ब्लू’ फिल्म की तरह….चांदनी और केवला दोनों निर्वस्त्रा थे।
उनके तन पर एक भी कपड़ा नहीं था। केवला चांदनी की गोरी-गोरी गुदाज जांघों को सहलाते हुए बीच-बीच मंे उन्हें चूम भी रहा था। उसके हाथों तथा हांेठों का जादुई स्पर्श ही चांदनी के मुंह से सीत्कार निकाल रही थी।
चांदनी की खुली हुई जुल्फें उसके कंधों तथा तकिए पर फैली हुई थीं। ठीक वैसे ही जैसे सावन के महीने में आकाश पर काली घटायें छा जाती हैं। उसकी आंखें केवला पर टिकी हुई थीं और मस्ती का आलम इतना गहरा था कि उसके अपने ही दोनों हाथ अपने गोरे मादक कबूतरों को मथ रहे थे।
केवला काफी देर तक चांदनी की जांघों को चूमता रहा, तो चांदनी ने अधीर होकर उसके बाल अपनी मुट्ठी मंे जकड़े और उसे अपने ऊपर खींच लिया। चांदनी के हाथ भी केवला के बदन पर करामात दिखाने लगे…

 

”केवला…अब एक अच्छे मर्द की तरह मुझे तृप्त कर दो।“ चांदनी ने केवला का हाथ उठाया और अपने सफेद ‘कबूतर’ की लाल ‘चांेच’ पर रख दिया, ”इन्हंे प्यार करो, मुझे प्यार करो… मेरे बदन के एक-एक अंग को प्यार करो।“
”ये लो जानेमन।“ कहकर केवला, चांदनी के कबूतरों को बेरहमी से मसलने लगा, ”कितने प्यारे कठोर कबूतर हैं। इनकी लाल चांेच तो और भी लाजवाब है। इन्हें तो पहले पुचकारूंगा मैं।“ कहकर अपने होंठों से चुमने व प्यार करने लगा वह कबूतरों लाल चोंचों को।
”ओह…केवला।“
”स..ओ.ह..चांदनी।“
”मेरे केवला।“ चांदनी कामुक स्वर में केवला के कान के पास फुसफुसा कर बोली, ”लोहा गर्म है…अब मार भी दो न…।“
”क्या मार दूं जानेमन?“ केवला भी आनंद के लोक में सफर करता हुआ बोला।
”अपना ‘हथौड़ा’ मार दो।“
चांदनी का कहना था कि तपाक से केवला ने चांदनी के पिघलते ‘लोहे’ पर अपने ‘हथौड़े’ की चोट कर दी।“
चोट इतनी जबरदस्त थी, कि चांदनी बिलबिला कर रह गई। वह मुंह सिकौड़ते हुए बोली, ”आह… केवला… बड़ा ही खतरनाक है तुम्हारा नेवला।“ वह हौले से बोली, ”नेवले से कहो ज्यादा तेज उथल-पुथल न मचाये।“
”नेवला भी बेकरार था जानेमन तुम्हारी पनाह में खेलने के लिए।“ केवला भी मस्ती में बोला, ”अब तो खेलने दो इसे।“
फिर तो वाकई न जाने कितने ही चोटें अपने हथौडे़ से दे मारी थीं कि केवला ने चांदनी के लोहे पर।
यह सब देखकर सुलेखा के चेहरे पर पसीना छलक उठा। अजीब-सा हाल हुआ था उसका। जिस्म में अजीब-सी मस्ती भरी थी, तो आंखों में खुमारी। कुछ सोचकर सुलेखा लौट गयी।
लगभग 28 साल की थी सुलेखा। गोरा-गोरा गदराया यौवन, बड़ी-बड़ी आंखें तथा दिलकश चेहरा। सुलेखा की शादी हो चुकी थी, लेकिन उसे अपने मर्द से प्यार नहीं था। इसका कारण था, सुलेखा का पति राजदास खूबसूरत नहीं था, बल्कि वह शारीरिक रूप से भी काफी कमजोर था।

 

सुलेखा उससे एक बार भी तृप्त नहीं हो सकी थी। यही कारण था कि वह काफी चिड़चिड़ी हो गयी थी, लेकिन उस दिन उसने अपनी आंखों से चांदनी तथा केवला के संभोग दृश्य को देखा, तो उसके अंदर की दबी उत्तेजना भड़क उठी थी। अब उसका मन किसी ऐसे ही मजबूत मर्द के साथ हम-बिस्तर होने के लिए मचल उठा।
सुलेखा ने सोचा, चांदनी भी तो पति के रहते हुए एक पराये पुरूष से हम-बिस्तर होती है, तो इसका कारण भी वही है, अर्थात् उसे अपने पति से संतुष्टि नहीं होती होगी, मेरी ही तरह। तभी तो वह पराए पुरूष के दामन से चिपक गयी है।
उस शाम सुलेखा, चांदनी के पास पहुंच गयी। दोनों इधर-उधर की बातें करती रहीं। फिर सुलेखा असली मकसद पर आ गयी, बोली, ”चांदनी सच बता, क्या तुम्हें अपने मर्द से खुराक नहीं मिलती है, जो एक पराए पुरूष से वसूल करती हो?“

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पहले तो चांदनी हड़बड़ा-सी गयी, लेकिन जब सुलेखा ने बताया कि उस दिन सुबह उसने उसे तथा केवला को बंद कमरे में काम-क्रीड़ा मंे लीन देखा था, तो वह लजा कर रह गयी।
सुलेखा ने कहा, ”चांदनी, शरमाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जो हाल तुम्हारा है, वही हाल मेरा भी है। अंतर सिर्फ इतना है कि तुमने तो अपनी देह-पूर्ति का साथी ढूंढ लिया है, लेकिन मुझे एक साथी की तलाश है, जो मेरी देह के रोम-रोम की प्यास बुझा सके। बताओ तुम्हारी नज़र में ऐसा कौन मर्द है, जिस पर डोरे डाले जा सकें, तो वह मेरे काम का साबित होगा?“
चांदनी ने पलभर तक कुछ सोचा, फिर उसने केवला का नाम बताया। साथ ही कहा, ”बहन, हल तो सभी चला लेते हैं और गाड़ी की सवारी कोई भी कर सकता है, लेकिन हुनर किसी-किसी में होता है। वह असली हुनरबाज है केवला, जो इस खेल का माहिर खिलाड़ी है।“
कुछ देर तक दोनांे औरतें रोमांटिक अंदाज में बातें करती रहीं।
फिर उस रात केवला, चांदनी के घर आया, तो उसने चांदनी की जगह सुलेखा को बैठे हुए देखा।
केवला ने चांदनी के बारे में पूछा, तो सुलेखा अपने अधरों पर अजीब-सी कामुक मुस्कान लाकर बोली, ”क्यों….तुम केवल चांदनी को ही जानते हो? क्या तुम अपनी पड़ोसन को भूल गये? मैं तुम्हारी खिदमत करने आयी हूं और मैं भी तुमसे यही अपेक्षा रखती हूं कि तुम भी मेरी भरपूर सेवा कर सको, ठीक चांदनी की तरह….सुबह की तरह।“

केवला को समझते देर नहीं लगी कि सुलेखा को सब पता चल गया है कि उसके और चांदनी के दरम्यान क्या संबंध हैं?
अगले पल कुछ सोचकर केवला मुस्कराया, ”चांदनी….सुलेखा, वाह! अब वह एक साथ दो-दो नावों की सवारी करेगा। कितना खुशनसीब है वह कि औरत खुद उसके आगे बिछने के लिए तैयार हो जाती है।“
उस रात केवला ने एक साथ दो-दो नावों की सवारी की। उसने चांदनी को तो तृप्त किया ही, साथ ही सुलेखा को भी जन्नत की सैर करायी। केवला से भरपूर देह-सुख प्राप्त करके सुलेखा की दुनियां ही बदल गयी। उसकी जवानी फिर से लौट आयी। वह खुश रहने लगी।

केवला हर दूसरे-तीसरे दिन चांदनी तथा सुलेखा की प्यास बुझा जाता था। दोनों औरतें खुश रहती थीं, लेकिन केवला खुश नहीं था।
दरअसल, वह सोच रहा था कि प्यार के इस खेल में एक दिन उसकी जान न चली जाये। उसने पढ़ा-सुना था कि ऐसे संबंधों की परिणति अत्यंत भयावह होती है। एक न एक दिन लोंगों को सच्चाई का पता चल जायेगा।
उसी दिन न केवल इस खेल का खात्मा होगा, बल्कि हो सकता है कि उसकी जिन्दगी का कनेक्शन भी टूट जाये। तों क्यों न वह स्वयं ही पहल करके दोनों औरतों से पिंड छुड़ा ले।
यही सब सोच-विचार कर केवला ने एक दिन फैसला कर ही लिया और चांदनी अथवा सुलेखा दोनों मंे से किसी को भी कुछ बताये बगैर कहीं गायब हो गया। उस रोज के बाद केवला को गांव में नहीं देखा गया।
कहानी लेखक की कल्पना मात्र पर आधारित है व इस कहानी का किसी भी जीतिव या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह केवल संयोग मात्र होगा।

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